Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
न क्वचिद्याति विश्वासं मृगी ग्रामगता यथा ।
कल्लोलकलितं चेतस्तेषां जल इवाऽहिते ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
तब वृत्ति से विशिष्ट चित्त के रहने पर जीवन्मुक्त अचित्त कैसे ? इस पर कहते हैं।
हे श्रीरामजी, भीतर से सब कुछ का परित्याग कर सुशीतल ब्रह्मरूप आशय में लगा हुआ जो चित्त
है, वह कदाचित् वृत्ति से युक्त हो गया, तो भी वह असत् स्वरूप ही है