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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verses 47–48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, verses 47–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

पातोत्पातकराकाराः क्षीयन्ते कन्दुका इव । इतो गच्छन्ति नरकं ततः स्वर्गमिहैव च ॥ ४७ ॥ आवृत्तिभिर्निवर्तन्ते सरसीव तरङ्गकाः । तस्माच्चैतां परित्यज्य दुर्दृष्टिं रघुनन्दन ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, जिनका चित्त सत्त्वरूपता प्राप्त कर चुका है, ऐसे ज्ञान के पारंगत हुए वे महात्मा “अचित्त शब्द से व्यवहृत होते हैं । प्रारब्ध का क्षय हो जाने पर वे चिदाकाशस्वरूप हो जाते हे