Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 85
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, verse 85 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 85
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
श्रीरामभद्र, संवेदन से
रहित (घटादि आकार वृत्तियों से वर्जित) योगी लोग उसी असीम आनन्द में स्थित रहते हे ।
यदि शंका हो कि अन्याकार संवेदन का अभाव होने पर भी ब्रह्माकार वृक्तिरूप संवेदन का समाधि
में तो निवारण नहीं कर सकते, ऐसी स्थिति में असंवितृत्व कैसे 2 तो इस पर कहते हैं :
आनन्दमय ध्येयरूप होने से अपरिच्छिन्न ब्रह्माकार वह संवेदन भी अपने द्वारा प्रदीप्त ब्रह्मरूप
ज्योति से बाधित होकर उसी के अन्दर लीन हो जाता हे