Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
रोचते तत्तदाप्नोषि कालेन बहुना पदम् ।
न शक्यते मनो जेतुं विना युक्तिमनिन्दिताम् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्ममिथ्याज्ञान से युक्त हुए पुरुष भीतरी वासनाओं से
वशीकृत होकर, विष से वशीकृत पुरुष की नाई, अनेक मानसी आपत्तियों से विकल रहता है ॥३ ३॥
वही चित्त की चित्तता के रूप से वासना प्रयुक्त उत्पत्ति है, इस आशय से कहते है ।
हे श्रीरामजी, जिससे अनात्म-वस्तु में आत्मत्वबुद्धिरूप अयथार्थ ज्ञान ओर अवस्तु में वस्तुत्व-
रूप अयथार्थ ज्ञान होता है, उसको आप चित्त जानिए