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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 94

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, verse 94 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 94

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जैसे कोशकारकृमि अपने आपको बोधिता हुआ तथा छुडाता हुआ देखा जाता है, वैसे ही प्रकृत आत्मा के विषय में भी जानना चाहिए, ऐसा कहते है । जैसे कोवे का निर्माण करनेवाला रेशम का कीट अपने आपको स्वभाववश से बाँधकर और दुःखभोग कर दीर्घकाल के अनन्तर केवलता प्राप्त करता है, वैसे ही संवित्‌ भी अपने आपको संसार में बाँधकर और दुःखभोग कर दीर्घकाल के अनन्तर स्वभाववश से स्वयं ही बन्धन आदि से निर्मुक्त होकर केवलता प्राप्त करती है ॥९ ३॥ जगत्रूपी समुद्रो का संवित्‌ ही पर्याप्त जल है, यही अपूर्वं दिशाओं का मण्डल है और यही पर्वत आदि भावों को प्राप्त होकर प्रस्फुरित होती है