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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 81

अस्सीवाँ सर्ग समाप्त इक्यासीवाँ सर्ग राजा का क्रम से अवशिष्ट प्रश्नों का उत्तर देना तथा विशेषज्ञ होने के कारण कहींपर मन्त्री द्वारा कहे गये प्रश्नों में युक्ति-प्रदर्शन ।

85 verse-groups

  1. Verse 1राक्षसी ने कहा : हे राजन्‌, आपके मन्त्री की परमार्थोक्ति अत्यन्त पवित्र है, यह कम आश्चर्य…
  2. Verses 2–5राजा राक्षसी के अभिप्राय को जानकर सव प्रश्नों के मुख्य तात्पर्यविषय ब्रह्म को विरोधाभासोक…
  3. Verse 6यह ब्रह्माणु अपने को वायुरूप से देखकर माया के विवर्तं से वायु हुआ है, इसलिए वह अन्यथाग्रह…
  4. Verse 7"कः शब्दोऽशब्द एव च“ इत्यादि प्रश्न का समाधान करते है । इसी प्रकार वही शब्दसंवेदन द्वारा…
  5. Verse 8"कः सर्वा न च किंचिच्च' इत्यादि प्रश्न का उत्तर कहते हैं। वही अणु सब हे और कुछ भी नहीं हे…
  6. Verse 9किं प्रयत्नशतप्राप्यम्‌', 'लब्धं न किंचिद्भवति'" इन प्रश्नों का उत्तर देते हैं। आत्मा सैं…
  7. Verse 10तो क्या ज्ञानरूप प्रयत्न निष्फल ही है, इस शंका का परिहार करते हुए किन्तु सर्व न लम्पते' इ…
  8. Verse 11(स्वस्थेन जीवितेनोच्चैः ˆ इस प्रश्न का समाधान करते हैँ । जैसे मरूभूमि में सूर्य प्रकाश जल…
  9. Verses 12–13किस अणु से मेरूपर्वत अपने अन्दर किया जाता है और त्रिभुवन तृण बनाया जाता है, इन प्रश्नों क…
  10. Verse 14सृष्टि में भी दूसरे तीसरे पर्वो से स्वतः तत्‌-तत्‌ सृष्टि हुई यह नियम हे । आशय यह है कि आ…
  11. Verse 15आविर्भूत हुए चित्तवाले जिसके अन्दर जो-जो वस्तु जैसे प्रतिभासित होती है, उसको वह वैसे ही द…
  12. Verse 16किस अणुमात्र से सौ योजन की पृथ्वी पूर्ण हुई है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। देशतः परमाणु…
  13. Verse 17कौन अणु होता हुआ भी सैकड़ों योजनो में नहीं समाता, इस प्रश्न का उत्तर देते हैँ । सर्वव्याप…
  14. Verses 18–19जैसे धूर्त लंपट पुरुष मुग्ध स्त्रीजनो को सुन्दर भ्रूविकारों, नयनो द्वारा निरीक्षणो ओर विव…
  15. Verse 20किस अणु के उदर मे पर्वतो की घटाएँ विद्यमान हैं, इसका उत्तर देते है। जैसे वस्त्र अपने अन्द…
  16. Verse 21अपनी अणुता का त्याग नहीं करता हुआ कौन अणु मेरु से भी विशाल आकारवाला है, इस प्रश्न का उत्त…
  17. Verse 22प्रत्येक प्रश्न में आत्मा के लिए अणु शब्द का राक्षसी ने जो प्रयोग किया है, उसका मंत्री ने…
  18. Verse 23यदि ऐसा है, तो (अणोरणीयान्‌ महतो महीयान्‌“ “एषोऽणुरात्मा चेतस्रा वेदितव्यः“ इत्यादि श्रुत…
  19. Verse 24कौन अणु प्रकाश और तमका दीपक है, इस प्रश्न का उत्तर कहते है । पूर्वोक्त अनुभवरूप परमात्मा…
  20. Verse 25दूसरी बात यह भी है कि यदि उसकी असत्ता हो जाती, तो जगत्‌ अन्धा हो जाता, ऐसा कहते हैं। यदि…
  21. Verse 26चिदणु ने अपने मे ही तेज, तम आदि की कल्पना कर रक्खी है, इसलिए प्रकाश उसके अधीन है, ऐसा कहत…
  22. Verse 27यदि कोई शंका करे कि सूर्य, चन्द्र आदि से भी प्रकाश की सिद्धि हो सकती है, फिर चिदणु ने क्य…
  23. Verse 28काला कुहरा छा जाने पर यह मेघ है, ऐसा व्यवहार होता है, अतः मेघ ओर कुहरे मेँ जितना भेद होता…
  24. Verses 29–31चित्‌ के अधीन प्रकाश से सत्तावान्‌ होने के कारण भी प्रकाश और तम का भेद नहीं है, ऐसा कहते…
  25. Verses 32–33चैतन्य का तो कहींपर भी अप्रकाश नहीं हो सकता, ऐसा कहते हैं। चिद्रूपी एक सूर्य रात-दिन आलस्…
  26. Verse 34जैसे तप रहे सूर्य से पद्म ओर नील कमलो का विकास होता है, वैसे ही चित्‌ने प्रकाश और तमकी सत…
  27. Verses 35–37किस अणु के उदर मे सम्पूर्ण अनुभवरूपी अणु है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। जैसे शहद के रस…
  28. Verse 38कौन अणु मधुर आदि रसो से शून्य होने के कारण स्वादरहित भी अत्यन्त स्वाद देता है, इसका उत्तर…
  29. Verse 39सवका त्याग कर रहे किस अणुने इस सम्पूर्ण जगत्‌ को आश्रित कर दिया है, इसका उत्तर कहते हैं।…
  30. Verse 40अपने स्वरूप के भी आच्छादन में असमर्थ किस अणु ने इस सम्पूर्ण जपत को आच्छादित कर रखा है, इस…
  31. Verse 41उक्त अर्थ के आशय को ही विशेष रूप से स्फुट करते हैं। जैसे हाथी दूब के वन में तनिक भी, क्षण…
  32. Verse 42इस प्रकार के प्रकाशस्वरूप पूर्णात्मा की बालक के तुल्य आत्मविस्मृति कैसे हो सकती है, इस पर…
  33. Verse 43प्रलय से तिरोहित भी जगत्‌ किस अणु की सत्ता से सत्‌ होकर पुनःजीवित होता है ? इस प्रश्न का…
  34. Verse 44यदि प्रलय में और सृष्टि में भी ब्रह्म की सत्ता से ही जगत्‌ जीवित रहता है, तो प्रलय की अपे…
  35. Verse 45इस प्रकार चित्‌ ओर जगत का तत्वतः भेद नहीं है, ऐसा कहते हैं। इस जगत्‌ को सत्य चिन्मय ही आप…
  36. Verse 46जिसके अवयव उत्पन्न ही नहीं हुए, ऐसा कौन अणु सैंकड़ों हाथ, सिर, लोचन आदि से युक्त है ? इस…
  37. Verses 47–48कौन निमेष होता हुआ भी महाकल्प ओर करोड़ों कल्परूप है, इस प्रश्न का उत्तर कहते हैं । स्वप्न…
  38. Verses 49–50जैसे स्वप्न में भोजन न करनेपर भी “मैंने अच्छा भोजन कर लिया" इस प्रकारकी प्रतीति होती हैं,…
  39. Verse 51किस अणु बीज में वृक्ष के समान सम्पूर्ण जगत्‌ स्थित है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। चिदात…
  40. Verse 52जो वस्तु जहाँ पर है, वह वहाँ से उत्पन्न होती है ओर तद्रूप ही हे, जैसे स्तम्भ में बनी हुई…
  41. Verse 53सृष्टि के समय जिनकी बीजपरम्परा की अवधि अव्यक्त है, ऐसे सब बीज सृष्टि के समय जगद्गूप से वि…
  42. Verse 54जैसे बीज के अन्दर वृक्ष रहता है, वैसे ही किस निमेष के अन्दर कल्प स्थित है ? इस प्रश्न का…
  43. Verse 55"कः प्रयोजन-करतरत्वमप्यनाश्रित्य कारक.“ (अक्रिय होने के कारण कारक- व्यापारयितृत्वरूप कर्त…
  44. Verse 56शुद्ध चैतन्यरूप परमाणु से यह जगत्सत्ता उदित हुई है और क्रिया और भोग के सम्बन्ध के बिना ही…
  45. Verse 57उसका क्रिया और भोग से सम्बन्ध क्यो नहीं है 2 इस पर कहते हैं। जगत्‌ सदा हि किसीसे कुछ नहीं…
  46. Verse 58शकरा : यदि ऐसा है तो असरत्‌ दृश्य का खण्डन वेदान्तो में किसलिए किया जाता है ? समाधान : व्…
  47. Verse 59कौन नेत्ररहित द्रष्टा दृश्य की सिद्धि के लिए अपने स्वरूप को दृश्यता को प्राप्त कर अपने को…
  48. Verse 60यदि कोई शंका करे कि ब्रह्म तो तदेतदृब्रह्मापूर्वणमनपरमननन्‍्तरमबाह्मम्‌” इस श्रुति के अनु…
  49. Verse 61दुश्य की सिद्धि के लिए अपने को दृश्यता को प्राप्त करता हुआ यहाँ तक के प्रश्नांशका तात्पर्…
  50. Verse 62सत्‌ ही असत्‌ के समान स्थित है, ऐसा जो ऊपर कहा था, उसका उपपादन करते है । द्रष्टा असत्‌ अत…
  51. Verse 63इसी प्रकार द्रष्टता भी मिथ्याभूत दृश्यसापेक्ष होने के कारण मिथ्या ही है, ऐसा कहते हैँ । न…
  52. Verse 64इस प्रकार परस्पर सापेक्ष कल्यनावाले होने के कारण वे दोनों ही मिथ्या हैं ऐसा कहते हैं । जै…
  53. Verses 65–66द्रष्टा ही दृश्यता को प्राप्त होता है और दुश्यके बिना द्रष्टत्वका सम्भव नहीं है, जैसे कि…
  54. Verse 67जैसे सुवर्णमय कटक सुवर्ण के निर्माण में समर्थ नहीं है, वैसे ही दृश्य द्रष्टा के निर्माण म…
  55. Verse 68चित्‌ चेतन हे, अतएव वह जैसे सुवर्ण कटकभ्रम को उत्पन्न करता है, वैसे ही दृश्यभ्रमका निर्मा…
  56. Verse 69यदि द्रष्टा ही दृश्यता को प्राप्त होता है, तो यह ब्रष्टा ही है, यों दृश्य की प्रतीति क्यो…
  57. Verse 70तब तो द्रष्टा का स्फुरण न होने पर दृश्य द्रष्टनिरपेक्षतावाला ही क्यो न होगा ? ऐसी यदि कोई…
  58. Verse 71कटकत्व की प्रतीति होने पर जैसे सुवर्ण की सुवर्णता सत्य होती हुई भी स्फुरित नहीं होती, यह…
  59. Verse 72द्रष्टा अपने को दृश्य देखता हुआ अपने स्वरूप को नहीं देखता, द्रष्टा की दृश्यत्वापत्ति होने…
  60. Verse 73कौन ज्ञान से दृश्य के नष्ट हो जाने के कारण अखण्डित अपने आत्मा को दृश्य की असिद्धि के लिए…
  61. Verse 74दृश्य का दर्शन न होने पर भी द्रष्टा का दर्शन अपरिहार्य है, इसलिए आत्यन्तिक दृश्य का अदर्श…
  62. Verse 75शुद्ध संविद्रूप आत्मा से इस सबका यथावत्‌ ज्ञान प्राप्त करके वाणियों का अविषय शुद्ध कुछ ही…
  63. Verses 76–77द्रष्टा का, दर्शन का ओर दृश्य का कौन अवभासन करता है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं । इस चित…
  64. Verse 78किससे कोई पृथक्‌ नहीं है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। जैसे जल, भूमि आदि पाँचभूतों से भौ…
  65. Verse 79दृश्य की अपृथकता का युक्ति से भी अनुभव कराते हैं। सर्वगामी अनुभवरूप होने से और सबका अनुभव…
  66. Verse 80किसकी इच्छा से यह पृथक्‌ है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। जैसे जलराशि से तरंगता पृथक्‌ नह…
  67. Verse 81देश, काल आदि से अनवच्छिन्न, असरत्‌ होते हुए भी सत्‌ किससे द्वैत भी अभिन्न है, इस प्रश्न क…
  68. Verses 82–83“असत्‌ भी सत्‌ रूप किससे“ पूर्वोक्त इस अंश का तात्पर्य कहते हैं । जिनमें आत्मसत्ता संदिग्…
  69. Verses 84–87यदि कोई शंका करे कि द्वैत अन्यसापेक्ष होने के कारण मिथ्या हो, ऐक्य तो दूसरे किसीकी अपेक्ष…
  70. Verse 88जैसे जलराशि से द्रवता पृथक्‌ नहीं है, वैसे ही किससे द्वैत भी पृथक्‌ नहीं है, इस प्रश्नांश…
  71. Verse 89द्वैत और अद्वैतकी प्रतीति दुःखरूप प्रवृत्ति की सिद्धि के लिए ही है, निवृत्ति के लिए नहीं…
  72. Verse 90भूत, भावी और वर्तमान जगत्‌ किसके अन्दर रहता है ? इस प्रश्न का उत्तर कहते हैं। भूत, भविष्य…
  73. Verse 91जैसे पवन अपने ही शरीर में स्पन्द को उत्पन्न कर देता है और लीन भी कर लेता है, वैसे ही इस आ…
  74. Verse 92यह जगत्‌ बृहद्भ्रम है, इस अंश का उपपादन करते हैं। यह आत्मचिति मायाशबल होने के कारण माया ह…
  75. Verse 93यदि एक अद्वितीय ब्रह्म ही है“ इस श्रुति से माया की भी असत्ता प्रतिपादित है, तो जगत्‌ चिदण…
  76. Verse 94जैसे बीज के अन्दर वृक्ष रहता है, वैसे ही यह जगत्‌ किसके अन्दर स्थित है, इस प्रश्न का उत्त…
  77. Verse 95बीज के अन्दर जैसे वृक्ष रहता है, इस अंश का वर्णन करते हैं। जैसे बीज के अन्दर फल पल्लवं से…
  78. Verse 96जैसे बीज के अन्दर अपने शाखा, फल, फूल आदि का त्याग न करता हुआ वृक्ष स्थित है, वैसे ही चिदण…
  79. Verses 97–101अपनी एकता का त्याग न करता हुआ उदित न हुआ भी कौन उदित होता है, इस प्रश्न में स्थित स्वमेकम…
  80. Verse 102उक्त अर्थ में दृष्टान्त देते हैं । जैसे वृक्ष बीजों को उत्पन्न करता हुआ और वृक्षस्वभाव को…
  81. Verse 103उन दोनों मे विशेषता इतनी ही है कि वृक्ष बीजरूप से ही विकारी नहीं हे, किन्तु वृक्षरूप से भ…
  82. Verse 104हे राजन्‌, जिसकी अपेक्षा स्थूल होने के कारण बिसतन्तु (कमल-नाल का तंतु) महामेरू है, वह कौन…
  83. Verse 105दृष्टान्त में उक्त का दार्ष्टान्तिक में समन्वय करते हुए 'ऐसे किसके उदर में करोड़ों मेरुमन…
  84. Verse 106यह त्रिजगत्‌ किसके द्वारा निर्मित है ? इस प्रश्न का उत्तरदेतेहै। जैसे आकाश द्वारा गन्धर्व…
  85. Verse 107“किसके दर्शन से निर्मलद्ठष्टि होकर तुम उससे अन्य नहीं होते अथवा सदा ही तद्रूप होते हो“ इस…