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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 71

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verse 71 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 71

संस्कृत श्लोक

एकस्मिन्प्रतिभासे हि न स द्रष्टृदृश्ययोः । पुंप्रत्ययप्रकचने क्व पशुप्रत्ययोदयः ॥ ७१ ॥

हिन्दी अर्थ

कटकत्व की प्रतीति होने पर जैसे सुवर्ण की सुवर्णता सत्य होती हुई भी स्फुरित नहीं होती, यह कहना अयुक्त है, क्योकि यह कटक सुवर्ण है, इस प्रकार समानाधिकरण प्रतीति में दोनों की सत्ता का प्रतिभास होता है, वैसे ही मैं द्रष्टा हूँ, इस प्रतीति में भी दोनों की (दृश्य और द्रष्टाकी) समानाधिकरण्य से प्रतीति होती है, ऐसा यदि कोई कहे, तो उसपर कहते हैं। जैसे दूर स्थित विषय में यह पुरुष है या पशु है, इस पुरुषप्रतीतिकी उत्कट कोटिवाले संशय में पुरुषत्व का प्रतिभास नहीं होता, इसी प्रकार समानाधिकरण्य प्रतीतियों में भी उभयांश की एक प्रतीति में प्रमेयता नहीं हो सकती