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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 54

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verse 54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 54

संस्कृत श्लोक

निमेषकल्पावेतेन तुषेणान्नकणाविव । वलिता वेषचेत्याभ्यामणुः स्वात्माङ्गकं श्रितः ॥ ५४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे बीज के अन्दर वृक्ष रहता है, वैसे ही किस निमेष के अन्दर कल्प स्थित है ? इस प्रश्न का तात्पर्य कहते हैं । जैसे चावल और उसके अवयव धान की त्वचा से चारों ओर वेष्टित रहते हैं, वैसे ही निमेष और कल्प इस अणु से वेष्टित हैं और यह अणु चेत्यरूप कल्प ओर निमेषों से अपने एकदेशका आश्रय ले करके स्थित है, क्योकि “विष्टम्भ्याहमिंद कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्‌" इत्यादि भगवान्‌ का वचन हे