Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verses 29–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verses 29–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
जडयोरुपलम्भाय चिदादित्यः किलैतयोः ।
यदा तपति तेनैते लब्धसत्तैकतां गते ॥ २९ ॥
तपत्येकश्चिदादित्यो रात्रिंदिवमतन्द्रितः ।
अन्तर्बहिः शिलाद्यन्तरप्यनस्तमयोदयः ॥ ३० ॥
त्रिलोकी भाति तेनेयं जीवस्य प्रथितात्मनः ।
नानोपलम्भभाण्डाढ्या कुटी कठिनकोटरा ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
चित् के अधीन प्रकाश से सत्तावान् होने के कारण भी प्रकाश और तम का भेद नहीं है,
ऐसा कहते हैं।
इन जड़ प्रकाश और तम के प्रकाश के लिए यह चित्सूर्य तपता है, उसकी सत्ता से सत्तावाले
होकर ये एकता को प्राप्त हुए हैं