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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 40

संस्कृत श्लोक

अशक्तया स्वात्मगुप्तौ सर्वमाच्छादितं जगत् । चित्ताणुतामेव परां संप्रसार्य वितानवत् ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

अपने स्वरूप के भी आच्छादन में असमर्थ किस अणु ने इस सम्पूर्ण जपत को आच्छादित कर रखा है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। परिच्छिन्न होकर अपने स्वरूप के तिरोधान में असमर्थ इस चिदणुने सम्पूर्ण जगत्‌ को चँदवे की नाई अपनी उत्कृष्ट चित्ताणुता को फैलाकर आच्छादित किया है