Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
यो यो नाम रसः कश्चित्समस्तोऽप्यप्स्यवस्थितः ।
प्रतिबिम्बमिवादर्शे तं विना नास्त्यसौ स्वतः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
कौन अणु मधुर आदि रसो से शून्य होने के कारण स्वादरहित भी अत्यन्त स्वाद देता है,
इसका उत्तर देते हैं।
अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण अत्यन्त अस्वादु भी यह परमात्मारूपी अणु समग्र स्वादों की
सत्ता का एकमात्र हेतु होने के कारण स्वयं स्वाद को प्राप्त होता है ॥ ३ ७॥
सम्पूर्ण जलो के अन्तर्गत रसके आविभवि का वही निमित्त है, इसलिए भी वह स्वाद देता
है, ऐसा कहा जा सकता है, यह कहते हैं।
जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब रहता है, वैसे ही जल में जो कोई भी रस स्थित हे । वह उसीके
कारण है, उसके बिना स्वतः उसकी सत्ता नहीं रह सकती