Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
शुद्धसंवेदनाकाशरूपस्य परमाणुना ।
शोभते नहि साम्योक्तिर्मेरुसर्षपयोरिव ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रत्येक प्रश्न में आत्मा के लिए अणु शब्द का राक्षसी ने जो प्रयोग किया है, उसका मंत्री ने
जो अभिप्राय कहा, वही ककटीका भी अभिप्राय था और उसने उसे स्वीकार भी कर लिया,
ऐसा निश्चय कर राजा अपनी विशेषज्ञता दिखलाने के लिए मन्त्री द्वारा निरूपित अणुशब्दार्थ
को दूषित करते हैं।
शुद्ध चिदाकाशस्वरूप परब्रह्म का परमाणु से साम्य करना मेरु के साथ सरसों की
साम्योक्ति के समान मुझे अच्छा नहीं लगता, यानी जैसे मेरु के साथ सरसों की तुलना नहीं
५१ वस्त्र बुनकर उसमें पर्वत आदि की तस्वीर बनाई जाती है । वह चित्ररूप पर्वत वस्त्रवेष्टित
कहा जा सकता है, क्योंकि वस्त्रको लपेटने पर उसके बीचमें चित्रभूत पर्वत की स्थिति होती है ।
चित्रभूत पर्वत जैसे मिथ्या है वैसे ही आत्मचैतन्य में चित्रित जगद् ब्रह्माण्ड भी मिथ्या है ।
हो सकती वैसे ही शुद्ध संवेदनरूप आकाशात्मा परमात्मा के साथ परमाणु की तुलना नहीं हो
सकती । भाव यह कि वह अपिरिच्छिन्न है, अतः केवल सूक्ष्मता के कारण परिच्छेद के उत्कर्ष
के अवधिस्वरूप परमाणु के सादृश्य का अवलम्बन कर गौणी वृत्ति से (लक्षणा द्वारा) वह अणु
नहीं कहा जा सकता है