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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 55

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 55

संस्कृत श्लोक

उदासीनवदासीनो न संस्पृष्टो मनागपि । एष भोक्तृत्वकर्तृत्वैः स्वात्मा सर्वजगत्यपि ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

"कः प्रयोजन-करतरत्वमप्यनाश्रित्य कारक.“ (अक्रिय होने के कारण कारक- व्यापारयितृत्वरूप कर्तृत्व का आश्रय न ले करके भी कौन कर्ता है) इस प्रश्न का उत्तर कहते हैं । सम्पूर्ण जगत्‌ में भोक्तृत्व, कर्तृत्व आदि से तनिक भी स्पृष्ट नहीं हुआ उदासीन के तुल्य स्थित यह आत्मा कर्ता न होता हुआ भी कर्ता है