Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 105
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verse 105 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 105
संस्कृत श्लोक
बिसतन्तुर्महामेरुः परमाणोः किलात्मनः ।
तस्यैव तद्घनाः स्वान्तः स्थिता मेर्वादिकोटयः ॥ १०५ ॥
हिन्दी अर्थ
दृष्टान्त में उक्त का दार्ष्टान्तिक में समन्वय करते हुए 'ऐसे किसके उदर में करोड़ों
मेरुमन्दर है“ इस प्रश्न का उत्तर देते हैं ।
परमाणु के भी अन्दर आत्मरूप ब्रह्म की अपेक्षा बिसतन्तु भी महामेरु है ओर उसी के
अन्दर चिद्घन परमार्थस्वभाव करोड़ों मेरु पर्वत स्थित हैं