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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verses 76–77

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verses 76–77 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 76, 77

संस्कृत श्लोक

आत्मानं दर्शनं दृश्यं दीपेनेवावभासितम् । कृतं च सर्वमेतेन चिन्मात्रपरमाणुना ॥ ७६ ॥ मातृमानप्रमेयाख्यं बुधो निगिरति त्रयम् । हेमेव कटकादित्वमसन्मयमुपस्थितम् ॥ ७७ ॥

हिन्दी अर्थ

द्रष्टा का, दर्शन का ओर दृश्य का कौन अवभासन करता है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं । इस चित्परमाणुरूप दीपक ने सब द्रष्टा, दर्शन और दृश्य को अवभासित किया । जैसे सुवर्ण कटक आदि को अपने में लीन कर लेता है, वैसे ही इस द्रष्टा दर्शन और दृश्य को किसने अपने में लीन कर लिया है ? इस प्रश्न का पूर्वोक्त दरष्टान्तो के उपन्यास द्वारा ही अर्थात्‌ परिहार करते है । जैसे असत्स्वरूप उत्पन्न हुए कटक आदि को सुवर्ण अपनेमें लीन कर लेता हे, वैसे ही चित्परमाणुरूप दीप से प्रकाशित प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयरूप इन तीनों को विद्धान्‌ (ब्रह्मज्ञानी) निगल जाता है