Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 103
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verse 103 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 103
संस्कृत श्लोक
द्रुमो बीजतयैवाशु न संत्यक्तसमस्थितिः ।
तिष्ठत्यपगतस्पन्दस्त्यागात्यागपरोऽणुकः ॥ १०३ ॥
हिन्दी अर्थ
उन दोनों मे विशेषता इतनी ही है कि वृक्ष बीजरूप से ही विकारी नहीं हे, किन्तु वृक्षरूप से भी
विकारी है, क्योकि दोनों रूपों से उसमें विकाररूप विषमता देखी जाती है, आत्माणु तो असंग
अद्वितीय होने के कारण सबके त्याग में तत्पर है और सर्वानुगत सद्रूप होने के कारण सबके
अत्याग में तत्पर है ओर निर्विकार ही सदा रहता है