Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
तावज्जन्म वसन्तेषु संसृतिव्रततिश्चिरम् ।
विकसत्युदितो यावन्न बोधो मूलकाषकृत् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
तो क्या ज्ञानरूप प्रयत्न निष्फल ही है, इस शंका का परिहार करते हुए किन्तु सर्व न
लम्पते' इसका तात्पर्य कहते हैं।
तब तक जन्मरूपी वसन्तो में संसाररूपी लता चिरकालतक विकास को प्राप्त होती है,
जब तक संसार के मूल अज्ञान का नाश करनेवाला ज्ञान उदित नहीं होता । भाव यह कि जब
तक संसार के मूल अज्ञान का नाश नहीं हुआ, तब तक प्राप्त हुआ भी आत्मतत्त्व पूर्णरूप से
प्राप्त नहीं हुआ । बोध से तो उसका पूर्णरूपसे लाभ होता है, इसलिए ज्ञानरूपी प्रयास व्यर्थ
नहीं हे