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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

चिन्मात्रानुनयेनेदं जगत्सन्नपि जीवति । वसन्तरसबोधेन विचित्रेव वनावली ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रलय से तिरोहित भी जगत्‌ किस अणु की सत्ता से सत्‌ होकर पुनःजीवित होता है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। जैसे वसन्‍्तऋतु में पत्ते आदि को उत्पन्न करनेवाले रस आदि के उद्बोध से वनराजि विचित्र हो जाती है, वैसे ही प्रलय से लीन हुआ जगत्‌ भी चिन्मात्र के अवलम्बन से जीता है यानी प्रलय में भी चित्‌-सत्ता से ही जगत्‌ संस्कार शेष रहता है