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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

आत्मा यत्नशतप्राप्यो लब्धेऽस्मिन्न च किंचन । लब्धं भवति तच्चैतत्परमं वा न किंचन ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

किं प्रयत्नशतप्राप्यम्‌', 'लब्धं न किंचिद्भवति'" इन प्रश्नों का उत्तर देते हैं। आत्मा सैंकड़ों प्रयत्नों से अप्राप्य हे, उसके प्राप्त होने पर कुछ भी प्राप्तव्य नहीं रहता । वही परम प्राप्तव्य हे ओर कुछ भी नहीं हे । भाव यह है कि यह आत्मरूप होने के कारण पहले ही लब्ध है, इसलिए उसकी प्राप्ति मेँ प्रयत्न की सफलता नहीं है, उससे बढ़कर कोई उत्कृष्ट फल नहीं है, इस आशय से तुमने उक्त प्रश्न किया है