Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verse 61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
द्रष्टाऽदृष्टपदं गच्छन्नात्मानं संप्रपश्यति ।
नेत्रदृश्याभिपातीव सदेवासदिव स्थितम् ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
दुश्य की सिद्धि के लिए अपने को दृश्यता को प्राप्त करता हुआ यहाँ तक के प्रश्नांशका
तात्पर्य कहकर अवशिष्ट अंशका तात्पर्य कहते हैं ।
नित्य अपरोक्ष भी आत्मा अविद्या से आवृत्त न होने के कारण अन्तःकरण अवच्छेद सदा
स्फुरित हो रहा है अतः उस स्फुरण के अभिमान से द्रष्टा है ओर बाह्य विषयों के अवच्छेद से
आवृत्त होने के कारण अदृष्टविषय यानी नेत्रज्ञों से दृश्य होकर नेत्र द्वारा निर्गत
अन्तःकरणप्रणाली से बाहर जाकर सत् ही आत्मस्वरूप को असत् घटादिरूप-सा स्थित
देखता है यानी स्वात्मभूत चित् से ही प्रकाशित करता है, नेत्र से नहीं, क्योकि नेत्र तो केवल
द्वारमात्र हैं, इसलिए अनेत्रवान् कहा हे