Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verses 84–87
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verses 84–87 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 84
संस्कृत श्लोक
यत्र नास्ति द्वितीयो हि तत्रैकस्यैकता कथम् ।
एकतायामसिद्धायां द्वयमेव न विद्यते ॥ ८४ ॥
एवं स्थिते तु यस्तिष्ठंस्तत्तादृक्तदिवास्ति हि ।
तस्मान्न व्यतिरिक्तं तद्रूपं द्रव इवाम्भसः ॥ ८५ ॥
नानारम्भविभासं च साम्येनाक्षुब्धरूपिणः ।
बीजस्यान्तस्तरुरिव ब्रह्मणोऽन्तः स्थितं जगत् ॥ ८६ ॥
द्वैतमप्यपृथक्तस्माद्धेम्नः कटकता यथा ।
सम्यग्बुद्धावबोधो हि द्वैतं तच्च न सन्मयम् ॥ ८७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि द्वैत अन्यसापेक्ष होने के कारण मिथ्या हो, ऐक्य तो दूसरे किसीकी
अपेक्षा नहीं करता, अतः वास्तव ही है, ऐसी अवस्था में ऐक्य उसमें नहीं है, यह कैसे कहा 2
इस पर कहते हैं।
यदि कोई दूसरा हो, तब एककी एकता हो, द्वैत और ऐक्य की, छाया और धूप के समान,
परस्पर एक की दूसरे से सिद्धि होती है, अत: एेक्य की अन्यनिरपेक्षता कैसे ? ॥८ ३॥
द्वितीय की व्यावृत्ति के लिए कल्पित संख्यारूप एकत्व भी द्वितीयसापेक्ष होने से द्वित्व
आदि के समान ही है, इस आशय से कहते हैं।
जहाँ पर दूसरा नहीं है, वहाँ पर एककी एकता कैसे ? एकता के असिद्ध होने पर दोनों ही
नहीं है