Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verses 65–66
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verses 65–66 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 65,66
संस्कृत श्लोक
द्रष्टैव दृश्यतामेति न द्रष्टृत्वं विनास्ति तत् ।
विना पित्रेव तनयो विना भोक्त्रेव भोग्यता ॥ ६५ ॥
द्रष्टुर्दृश्यविनिर्माणे चित्त्वादस्त्वेव शक्तता ।
कनकस्यावदातस्य कटकादिकृताविव ॥ ६६ ॥
हिन्दी अर्थ
द्रष्टा ही दृश्यता को
प्राप्त होता है और दुश्यके बिना द्रष्टत्वका सम्भव नहीं है, जैसे कि पिता के बिना पुत्रका
सम्भव नहीं है ओर भोक्ता के विना भोग्यता का संभव नहीं हे । जैसे विशुद्ध सुवर्ण का कटक
आदि के निर्माण में सामर्थ्य है, वैसे ही द्रष्टा का दृश्यविनिर्माण में सामर्थ्य है ही, क्योंकि वह
चेतन हे