Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verses 18–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 18,19
संस्कृत श्लोक
यथा धूर्तेन खिङ्गेन पुंसा बालः प्रतार्यते ।
सुभ्रूविकारनयननिरीक्षणविचेष्टितैः ॥ १८ ॥
चिदालोकेन शुद्धेन सपर्वततृणं जगत् ।
नाट्यतेऽविरतं तद्वद्विवृत्त्याभिनयं सदा ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे धूर्त लंपट पुरुष मुग्ध स्त्रीजनो को सुन्दर भ्रूविकारों,
नयनो द्वारा निरीक्षणो ओर विविध प्रकारकी चेष्टा ओं से अपने वशमें कर अपनी ओर आकृष्ट
करता है, वैसे ही शुद्ध चिदालोक पर्वत और तृणों से युक्त जगत् को अपना अभिनय दर्शा कर
सदा नचा रहा है