Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
आत्मगुप्तौ न शक्नोति परमात्माम्बराकृतिः ।
मनागपि क्षणमपि गजो दूर्वावने यथा ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ के आशय को ही विशेष रूप से स्फुट करते हैं।
जैसे हाथी दूब के वन में तनिक भी, क्षणभर भी अपने स्वरूप को आच्छादित नहीं कर
सकता, वैसे ही शून्याकृति परमात्मा यद्यपि अपने स्वरूप को छिपाने में समर्थ नहीं है । तथापि
उसने विश्व को चारो और से आक्रान्त कर रक्खा हे, जैसे बालक जागकर धानकणों की रक्षा
करता है, सोकर नहीं करता वैसे ही ज्ञात होकर यह परमात्मा जगदन्त-पाती जीवों की आत्मलाभ
से रक्षा करता है