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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 88

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verse 88 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 88

संस्कृत श्लोक

यथा द्रवत्वं पयसः स्पन्दनं मातरिश्वनः । व्योम्नः शून्यत्वमेवं हि न पृथग्द्वैतमीश्वरात् ॥ ८८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे जलराशि से द्रवता पृथक्‌ नहीं है, वैसे ही किससे द्वैत भी पृथक्‌ नहीं है, इस प्रश्नांश का विवरण करते हैं। इस प्रकार परमार्थ तत्त्व के द्वैत और ऐक्य-शून्यरूप से स्थित होने पर जो द्वैत ओर एेक्य से युक्त-सा तथा द्वैत और एेक्य-सा दिखाई देता है, उससे द्वैत और एेक्य रूप वैसे ही भिन्न नहीं है जैसे कि जलराशि से द्रव भिन्न नहीं है ॥८ ५॥ द्रष्टा, दर्शन, दृश्यरूप सदसद्‌ त्रिजगत्‌को, जैसे बीज अपने अन्दर वृक्ष को रखता है वैसे ही, अपने अन्दर रखकर कौन स्थित है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं । जैसे पृथ्वी, जल आदि के साम्य से पूर्व अवस्था से च्युत न हुए बीज के अन्दर वृक्ष स्थित रहता है, वैसे ही सत्त्व, रज और तम के साम्य से अपनी पूर्व अवस्था से च्युत न हुए ब्रह्म के अन्दर नाना प्रकार के आरम्भ ओर स्फुरण से संयुक्त यह जगत्‌ स्थित है। जैसे सुवर्ण से कटकता अपृथक्‌ है, वैसे ही ब्रह्म से द्वैत भी अपृथक्‌ है, ऐसा भली भाँति जिसको ज्ञान हो चुका है, ऐसे पुरुष का ज्ञानरूप ही तो द्वैत है और ज्ञान सत्‌ ही है, सन्मय नहीं है ॥८ ६, ८ ७॥ जैसे जल की द्रवता जलसे पृथक्‌ नहीं है, वायु का स्पन्दन वायु से पृथक्‌ नहीं है तथा आकाश की शून्यता आकाश से पृथक्‌ नहीं है, वैसे ही द्वैत ईश्वर से पृथक्‌ नहीं है