Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
तेनैवानन्तरूपत्वादणुना वाससा यथा ।
संविदा तद्भवद्बाह्ये कृत्वा मेर्वादिवेष्टितम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
किस अणु के उदर मे पर्वतो की घटाएँ विद्यमान हैं, इसका उत्तर देते है।
जैसे वस्त्र अपने अन्दर स्थित मेरु आदि के चित्रको बाहर करके मानों आच्छादित करता
है, वैसे ही उस अणु ने ही अनन्तरूप होने के कारण भीतर स्थित मेरु आदि को बाहर करके
मानों संवित् से वेष्टित कर रक्खा है (४६)