Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
यदस्ति यत्र तत्तस्मात्समुदेति तदेव तत् ।
आकारिणि विकारादि दृष्टं न गगनेऽमले ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
जो वस्तु जहाँ पर है, वह वहाँ से उत्पन्न होती है ओर तद्रूप ही हे, जैसे स्तम्भ
में बनी हुई प्रतिमा स्तम्भरूप ही है, उससे भिन्न नहीं है । आकारवाले पदार्थ मेँ ही विकार
आदि देखे जाते हैं और आकाररहित निर्मल आकाशमें विकार आदि नहीं देखे जाते हैं