Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 11

95 verse-groups

  1. Verse 1उत्साह उत्पन्न करने के लिए उद्घाटन कर रहे महाराज श्रीवसिष्ठजी अविद्याक्षय होने पर परिशिष्…
  2. Verse 2आत्मभावना क्यो उदित नहीं होती ? इस पर कहते है । भद्र, यह अज्ञान अत्यन्त बलवान है, इसीका द…
  3. Verse 3बाह्य ओर आभ्यन्तर चक्षु आदि अत्यन्त बलिष्ठ अनेक प्रमाणो से गृहीत होनेवाले द्वैत से अभिन्न…
  4. Verses 4–5ज्ञान की सामग्री की दुर्लभता भी दिखलाते है । आत्मज्ञान तो सभी इन्द्रियों का अविषय है यानी…
  5. Verse 6अतएव पुनः-पुनः उपदेश ओर मनन आदि के अभ्यास की, अविद्या की, अविद्यारूपी लता की अनेक शाखाओं…
  6. Verse 7हे राघव, जिस प्रकार राजा जनक जी विदिततत्त्व होकर भूमण्डल में विहार करते हैं, उसी प्रकार आ…
  7. Verse 8जागते अथवा सोते तथा चलते या बैठते बाहर के व्यवहाररूप कार्य से तथा समाधिरूप अकार्य से विहा…
  8. Verse 9भगवान नारायण, अपने विभिन्न-विभिन्न प्रकार के लीला चरण करने के जिस निश्चय के कारण पृथ्वीपर…
  9. Verse 10हे राघव, जगदम्बा पार्वती के साथ रहनेवाले त्रिनेत्र महादेवजी का या राग-वर्जित ब्रह्मा का ज…
  10. Verses 11–13हे रामभद्र, देवताओं के गुरु बृहस्पति, दानवों के गुरु शुक्राचार्य, भगवान अंशुमाली सूर्य, च…
  11. Verse 14श्रीरामजी ने कहा : भगवन्‌, जिस निश्चय के कारण ये पूर्वोक्त महाबुद्धिमान धीर सुरगुरु आदि श…
  12. Verse 15महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे महाबाहो, हे राजकुमार, हे समस्त वेद्य पदार्थो के स्वरूप को जान…
  13. Verse 16उसी निश्चय को कहते हैं। श्रीरामजी, को कुछ भी यह भोग्य जगज्जाल दिखाई पड़ता है, वह सब मायिक…
  14. Verse 17संक्षेप से कथित अर्थ को विस्तार कर विशेषरुप से दिखलाते हैं। ब्रह्म ही चित्‌ है, ब्रह्म ही…
  15. Verse 18जैसे समुद्र तरंगों की परम्पराओं से अपने स्वरूप में बढता है, वैसे ही अनैकविध पदार्थलक्षिमय…
  16. Verse 19समस्त क्रिया, कारक और फ़ल ब्रह्मस्वरूप ही हैं, इस आशय से कहते हैं। ब्रह्म से ब्रह्म का ही…
  17. Verse 20इस दृष्टि से कहीं राग, द्वेष आदि की प्रसक्ति नहीं होती, इस आशय से कहते है । ब्रह्मस्वरूप…
  18. Verse 21इस परिपूर्ण ब्रह्म मेँ आकाश-वृक्ष की नाई, कल्पित राग आदि दोषों का अवस्थान-प्रसंग ही जब नह…
  19. Verse 22परिपूर्णस्वरूप इस परब्रह्म मे ही गमन आदि सब कुछ है, चूँकि परिपूणत्मिक ब्रह्म ही सुखेकरसरू…
  20. Verse 23ब्रह्म ही ब्रह्म में भली प्रकार तृप्त है, ब्रह्म में ब्रह्म ही भली प्रकार अवस्थित हे, ब्र…
  21. Verse 24श्रीरामजी, घट भी ब्रह्मरूप है, पट भी ब्रह्मरूप है, मैं भी ब्रह्मरूप हूँ, यह विस्तृत प्रपं…
  22. Verse 25इस दृष्टि से आत्यन्तिक अभय-प्राप्ति होती है, यह कहते है । भद्र, देहरूप ब्रह्म में मरणात्म…
  23. Verse 26इसी प्रकार भोग, राग आदि की आत्यन्तिक निवृत्ति भी सिद्ध होती है, ऐसा कहते है । संभोगात्मक…
  24. Verse 27हे राघव, जिस प्रकार वीचि (गमनशील तरंग) ओर जल के स्पन्दयुक्त होने पर भी जल से पृथक्‌ कुछ भ…
  25. Verse 28जैसे आवर्त के नष्ट होने पर जल में कुछ भी नष्ट नहीं होता, वैसे ही देहात्मक ब्रह्म में मरणर…
  26. Verse 29जडतारूपता के अपरित्याग से ही सब करमो मे ब्रह्मरूपता का ग्रहण न करें, इसलिए उसकी जडता का न…
  27. Verse 30जिस प्रकार सुवर्ण में कटकरूपत्व और जल में आवर्तरूपत्व का होना सुवर्ण और जल का एक स्वभाव ह…
  28. Verse 31मायिक स्वभाववश ही जीव और जड़रूप भेद की कल्पना है, इस आशय से कहते हैं । थह जीवभूत आत्मा है…
  29. Verse 32अतएव तत्त्ववेत्ता पुरुष को समस्त जगत एकमात्र आनन्दरसस्वरूप अनुभूत होता है, यह कहते हैं। ज…
  30. Verse 33जैसे बालक की दृष्टि में रात्रि स्वभ्रान्ति से परिकल्पित यक्षवाली और युवा, वृद्ध आदि पुरुष…
  31. Verses 34–35सदा-सर्वदा चारों ओर अवस्थित, अमृतपूर्ण ब्रह्मरूपी घट में न कोई मरता है और न कोई जीता है
  32. Verses 36–37जिस प्रकार महान सागर में उललास-विलास होने पर भी तरंग आदि न उत्पन्न होते हैं और न मरते हैं…
  33. Verses 38–39श्रीरामचन्द्रजी, शरीर के विनाश से ब्रह्म में मृतबुद्धि कैसे हो सकती है ? क्योकि शरीर आदि…
  34. Verses 40–41जैसे जल में जो कण है, जो कणिका हे, जो वीचि है, जो तरंग है, जो फेन है, और जो लहरी है, वे स…
  35. Verse 42जिस प्रकार सुवर्णं से बनी विभिन्न-विभिन्न आकृति-रचनाएँ सुवर्णं से पृथक नहीं होती हैं, उसी…
  36. Verse 43मन, बुद्धि, अहंकार, तन्मात्रा, इन्द्रियाँ आदि सब ब्रह्मस्वरूप ही हैं, उससे भिन्न नहीं है,…
  37. Verse 44जिस प्रकार एक ही शब्द पर्वत की संनिधि में प्रतिध्वनि के रूप में द्विरुक्त की नाई शोभित हो…
  38. Verse 45अज्ञात ब्रह्म ही जीवरूपता ओर जगद्रूपता को मानों प्राप्त होकर स्थित है, क्योकि स्वप्न में…
  39. Verse 46अज्ञान अत्यन्त विरुद्ध, असंभावित पदार्थ का निर्माण करता है, यह लोक मे प्रसिद्ध ही है, ऐसा…
  40. Verse 47इसीलिए, ब्रह्म, अज्ञो की दृष्टि से ही अज्ञानस्वरूप है, ज्ञानियों की दृष्टि से नहीं, ऐसा क…
  41. Verse 48ब्रह्मस्वरूप से ज्ञात ब्रह्म, तत्क्षण ही उस प्रकार ब्रह्मस्वरूप हो जाता है, जिस प्रकार सु…
  42. Verse 49आत्मा समस्त शक्तियों से परिपूर्ण स्वयं ब्रह्म है, वह किसी तरह के प्रयोजन के बिना स्वयं जि…
  43. Verse 50इसीलिए तत्त्वज्ञ पुरुष जीव या जगत के रूप मे उसे नहीं देखते, यह कहते है । कर्म, कर्ता ओर क…
  44. Verse 51उक्त स्वरूप से ज्ञात न हुआ ब्रह्म अज्ञानियों द्वारा अज्ञानशब्द से व्यवहृत होता है, ओर परि…
  45. Verse 52जिस तरह भली प्रकार अपरिचित बन्धु ही अबन्धु कहा जाता है, परिज्ञात हुआ वही बन्धुशब्द से व्य…
  46. Verse 53तब जीव और जगत में ब्रह्ममात्रत्व की भावना सहस्रा सभी को क्यों नहीं होती 2 यदि कहिए कि वैर…
  47. Verse 54जगत के विषय में उक्त विचारणा तत्पदार्थ के शोधन के रूप में पर्यवसित होती है, इस आशय से जगद…
  48. Verse 55जीवांश में भी वह त्वंपदार्थ के शोधनरूप से पर्यवसित होती है, इस आशय से जीवांश में उसी को स…
  49. Verse 56पदार्थ शोधक फलभूत अखण्ड वाक्यार्थवबोधस्वरूप से भी उसका पर्यवसान होता है, इस आशय से उसमें…
  50. Verse 57अपरिच्छिन्न स्वभाव से अखण्ड वाक्यार्थ के आविर्भूत होने पर जब ^त्वम्‌* “अहम्‌” ओर “इदम्‌”…
  51. Verse 58मुझे न दुःख है, न कर्म है, न मोह है, न कुछ अभिलाषा हे । (परब्रह्मस्वरूप में अवस्थान का पर…
  52. Verse 59मैं कलारूपी कलंकों से निर्मुक्त (तुम, “मे आदि कल्पनाओं से शून्य) हूँ, मैं सर्वविध विकारों…
  53. Verses 60–62आत्मा में परिच्छिन्नत्व और परोक्षत्व का एकमात्र निराकरण करने के लिए ही त्वम्‌” ओर 'तत्‌”…
  54. Verses 63–64मैं दयौ हूँ, मै सूर्ययुक्त आकाश हूँ, मैं दिशारूप हूँ, मैं विविध पृथ्वीरूप भी हूँ, मैं घट…
  55. Verse 65अंकुर, टहनी, प्रतान, शाखा आदि का अविर्भाव चाहनेवाले लता, गुल्म, अंकुर आदि के भीतर स्थित र…
  56. Verse 66चिदात्मा, ब्रह्म, सत्‌, सत्य, ऋत इत्यादि नामों से व्यापक, चेत्यशून्य, चैतन्मात्रस्वरूप ब्…
  57. Verse 67विषयसंसर्गशून्य चैतन्यमात्रस्वरूप, निर्मल, समस्त भूतों के स्वरूप का अवबोधक, सर्वत्र स्थित…
  58. Verse 68यदि शंका हो कि प्रतिपुरुष मन, बुद्धि ओर इन्द्रियो की वृत्तियों का पार्थक्य होने के कारण आ…
  59. Verse 69समस्त, शब्द स्पर्श आदि विषय; उनके हेतुभूत (आधारभूत) आकाश, वायु आदि तथा इनके द्वारा की गई…
  60. Verse 70समस्त वृत्तियों मे अनुगत तत्व का उपपादन कर रहे महाराज वस्िष्ठजी उक्त अर्थ को ही विस्पष्टर…
  61. Verse 71इसका भी पहले की नाईं उपपादन करते हुए उक्तार्थ को ही कहते हैं। अहंकाररूपी अशेष भोक्ताओं के…
  62. Verse 72“नित्यं वाऽनुभवामृतम्‌* इसका समाधिनिष्ठा के अनुभव से उपपादन करते हुए कहते हैं। सुषुप्ति क…
  63. Verse 73-संभोगोत्तमम्‌* यह जो पहले कहा, उसे, उपपादन करके, अनुभव में चढ़ाते हैं। रसना (जिह्ना) आदि…
  64. Verse 74विषयरूप उपाधि से निर्मुक्त होकर ज्ञानकी स्थिति हो ही नहीं सकती अथात्‌ अप्रसिद्ध ही है, ऐस…
  65. Verse 75आकाश में स्थित चन्द्रमा में लगे हुए भूमि में अवस्थित पुरुषों के नेत्रां की जो आकाशस्थ (मध…
  66. Verse 76उदासीन पुरुषों को सुख, दुःख आदि आकारवाली अन्य वृत्तियों के अभाव काल में निर्विशेष स्वात्म…
  67. Verse 77किसी एक देश में अवस्थित पुरुष का मन, जब अन्यत्र कहीं दूर देश में चला जाता है, तब वह मन अन…
  68. Verse 78पृथ्वी, जल, वायु ओर बीजों का संमेलन होने पर अंकुरादिरूप कार्यो मेँ बाहर निर्गमन के अनुकूल…
  69. Verses 79–84स्वयं अपने जडस्वभाव में अवस्थित खजूर, निम्ब ओर बिम्ब आदि फलों के रसविशेषों में भीतर विद्य…
  70. Verse 85इष्ट की प्राप्ति ओर अप्राप्ति होने पर आनन्द और खेद से युक्त जो संवित्ति प्रसिद्ध है, वही…
  71. Verse 86उसकी नखाग्र से लेकर सभी अंगों में व्याप्ति है ओर देह का छेद होने पर भी उसका विच्छेद नहीं…
  72. Verses 87–88समस्त जल को आक्रान्त करनेवाली वायु की गति से गतिशील और छोटे-छोटे जलकणों से रूप (अपना कल्प…
  73. Verse 89जिसका सार अनुभवमात्र से गम्य है, जो स्नेह से (चिकनाहट ओर उत्कट प्रेम से) उपलक्षित है तथा…
  74. Verse 90पर्वत आदि पदार्थ-समुदाय के बाहर एवं भीतर सर्वदा अनुगतरूप से सत्तावाली जो चिति है, वही मैं…
  75. Verse 91निखिल अनुभववृत्तियों के भेदो का जो स्वाभाविक आदर्श अर्थात्‌ दर्पण है ओर जो मललेखा यानी अज…
  76. Verse 92जगत्स्वामी होने से जो संपूर्ण इच्छाओं का फल देनेवाला हे, अग्नि, सूर्य आदि तेजो का जो प्रक…
  77. Verse 93जो संपूर्ण अवयवो में विश्रान्त एवं सम्पूर्ण अवयवो से परे हे तथा जिसका सदा-सर्वदा विकसित स…
  78. Verse 94घट, पट, तीर, कुआँ आदि में सद्रूप से स्थित; जरायुज, अण्डज, स्वेदज एवं उद्धिज्ज-इन चतुर्विध…
  79. Verse 95अग्नि आदि में उष्णता आदि के सत्तास्वरूर्पो का चित्‌ से ही स्फुरण होने के कारण परमार्थतः उ…
  80. Verse 96बाहर एवं भीतर सर्वत्र प्रकाशस्वरूप से विद्यमान, अपने आत्मपदार्थमें स्थित और प्रत्यगात्मरू…
  81. Verse 97मिश्री आदि समस्त मधुर पदार्थो में माधुर्यरूपता को, मिर्च आदि तीखे पदार्थो में तीक्ष्णरूपत…
  82. Verse 98जाग्रत अवस्था, स्वप्नावस्था एवं सुषुप्ति अवस्था मेँ एकरूप से स्थित, तुरीय पद ओर उससे भिन्…
  83. Verse 99जिसके सभी संकल्प अर्थात्‌ मानस कर्म शान्त हो गये हैं, जो निखिल कामों से रहित है, जो सभी प…
  84. Verse 100विषय-भोग की उत्कण्ठा से शून्य, प्रयत्न से रहित, चेष्टा से वर्जित, एकमात्र परिपूर्ण तथा अं…
  85. Verse 101जो सब भूतो के भीतर अवस्थित है, सर्वात्मक होते हुए भी जो दुरधिगम्य एवं एकरूप है तथा जो असं…
  86. Verses 102–103जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति को करनेवाले, त्रैलोक्य में रहनेवाले देहरूप मोतियों की माला मे…
  87. Verse 104बाहर ओर भीतर से अपने द्वारा व्याप्त हुए जगद्गूपी पक्षियों को, विचित्र बड़े जाल की नाई, अप…
  88. Verse 105अत्यंत विश्वास के योग्य अथवा चिदेकरस, पूर्णरूप, संपूर्ण सुख-लेशों के प्रतिष्ठाभूत और सभी…
  89. Verse 106स्नेह अर्थात्‌ तेल के आश्रयी तथा वर्षाकालीन वायुओं से उत्पन्न भँवरों से न बुझे हुए दीपक क…
  90. Verse 107कमलिनी की जड़ की नाई हृदयरूपी सरोवर में गुप्त होकर अवस्थित; हाथ, पैर आदि अंग- प्रत्यंगों…
  91. Verse 108प्रसिद्ध “अमृत” पदार्थ से इसकी विलक्षणता बतलाते हैं। हेश्रीरामजी, जो क्षीरसमुद्र से उत्पन…
  92. Verse 109जिसके द्वारा शब्द, रूप, रस, स्पर्श और गन्ध - ये पाँच विषय अभिव्यक्ति प्राप्त करते हैं अर्…
  93. Verse 110जो आकाश-मण्डल की नाई विस्तृतरूपवाला है, जो अपनी व्याप्ति के द्वारा संपूर्ण लोकों की अभिव्…
  94. Verse 111जो बड़ी-बड़ी विभूतियों से युक्त है और जो अद्वैत-दृष्टि से समस्त विभूतियों एवं महिमाओं से…
  95. Verse 112तादात्म्य के अध्यारोप की दृष्टि से यह सब जगत मैं ही हूँ, संसर्ग के अध्यारोप की दृष्टि से…