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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 85

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 85 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 85

संस्कृत श्लोक

आलोककारिणी कान्ता चिद्ब्रह्मेदमहं ततम् । संभोगानन्दलववदमृतास्वादशक्तिवत् ॥ ८५ ॥

हिन्दी अर्थ

इष्ट की प्राप्ति ओर अप्राप्ति होने पर आनन्द और खेद से युक्त जो संवित्ति प्रसिद्ध है, वही यदि शार्तरानुसारी हुए मनन से विशोधित होने पर आनन्द एवं खेद से निर्मुक्त हो जाय, तो वह ब्रह्मस्वरूप हो जाती है, ऐसा कहते हैं। मननोदय से विशोधित हुई संवित्ति इष्टप्राप्ति और इष्ट अप्राप्ति दोनों अवस्थाओं में आनन्द और खेद से निर्मुक्त होकर यदि एक-स्वरूप हो जाय, तो वह चिदात्मक निर्विकार ब्रह्मस्वरूप ही है, वही मैं हूँ॥८०। सूर्य का प्रत्यक्ष कर रहे, पृथ्वी में स्थित पुरुष का पृथ्वी से लेकर सूर्यपर्यन्त विस्तृत हुआ जो जो चक्षुरूपी सूत्र है, वह यद्यपि विषय प्रकाशन में समर्थ है, तथापि यदि उसके मध्य के तुल्य (नेत्र और सूर्य दोनों से असम्बद्ध मध्यवर्ती भाग के सदुश) विषय प्रकाशन से निर्मुक्त हो जाय, तो वह शान्त, निर्मल, व्यापक, परब्रह्मस्वरूप चित्‌ ही है, वही मैं हूँ ॥८ १॥ इसी प्रकार जाग्रत आदि तीनों अवस्थाओं का साक्षी आत्मा ही सुषुप्ति आदि का परित्याग होनेपर वुर्यभरत ब्रह्मस्वरूप है, यों कहते हैं। जाग्रत, सुषुप्त तथा स्वप्न सभी अवस्थाओं में साक्षीरूप से निरन्तर उदित उन अवस्थाओं से शून्य आदि-अन्त से रहित तुर्यस्वरूप विकारवर्जित चिदात्मक ब्रह्म ही मैं हूँ ॥८ २॥ सैकड़ों खेतों से उत्थित गन्‍नों में भीतर स्थित स्वादुरस के सदृश सैकड़ों पुरुषों के भीतर एकरूप से अवस्थित हुआ वही चैतन्यात्मक ब्रह्म है, तद्रूप मैं हूँ ॥८ ३॥ सूर्य की सर्वत्र व्यापक, स्वाभाविक स्वच्छस्वरूप प्रभा की नाईं प्रकाश करनेवाली कमनीय चिति ही ब्रह्म है, इन दृश्यमान पदार्थों के रूप से वही विस्तृत हुई है, तत्स्वरूप मैं हूँ ॥८ ४॥ संभोगआनन्दरूपी अंश से युक्त, अमृत-स्वाद की शक्ति से समन्वित, अपने एकमात्र अनुभव के स्वरूपभूत जो अविनाशी ब्रह्म है, वही मैं हू