Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
संस्थानरचना चित्रा ब्रह्मणः कनकादिव ।
नान्यरूपा विमूढानां मृषैव द्वित्वभावना ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार सुवर्णं से बनी विभिन्न-विभिन्न आकृति-रचनाएँ
सुवर्णं से पृथक नहीं होती हैं, उसी प्रकार ब्रह्म से हुई चित्र-विचित्र देहादि संस्थानों की रचना भी ब्रह्म
से विभिन्न नहीं हो सकती, अज्ञानियों को वृथा ही उसमें द्वित्वभावना होती है