Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 65
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
चिदात्मान्तर्गतं शान्तं परं ब्रह्म रसात्मकम् ।
यस्मिन्सर्वं यतः सर्वं यत्सर्वं सर्वतश्च यत् ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
अंकुर,
टहनी, प्रतान, शाखा आदि का अविर्भाव चाहनेवाले लता, गुल्म, अंकुर आदि के भीतर स्थित रसात्मक
शान्त परब्रह्मस्वरूप चिदात्मा मैं ही हूँ ॥ ६ ४॥ जिसमें सब कुछ स्थित है, जिससे यह सब उत्पन्न हुआ
है, जिसमें सब कुछ तिरोहित हो जाता है, जो चारों ओर व्यापकरूप से विद्यमान है अतएव जो सर्वात्मक
अद्वितीय आत्मस्वरूप से सम्मत है, वही पर ब्रह्म है, यह निश्चय है