Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 57
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
सति विस्तारजे तस्मिन्ब्रह्मेदमिति वेद्म्यहम् ।
त्वमहंत्वादिबाधे तत्सदित्यादि जगद्गतम् ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
अपरिच्छिन्न स्वभाव से अखण्ड वाक्यार्थ के आविर्भूत होने पर जब ^त्वम्* “अहम्” ओर “इदम्”
स्वरूप का बाध हो जाता है, तब पूर्वमे प्रसिद्ध सत्, चित्, प्रिय, नाम ओर रूप ये जो जगदगत पंचरूप
वस्तुजात है, उन्हे ब्रह्मरूप से जानता हूँ