Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
अज्ञानमेतद्बलवदविद्येतरनामकम् ।
जन्मान्तरसहस्रोत्थं घनं स्थितिमुपागतम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मभावना क्यो उदित नहीं होती ? इस पर कहते है ।
भद्र, यह अज्ञान अत्यन्त बलवान है, इसीका दूसरा नाम "अविद्या" है, वह अन्य असंख्य जन्मों से
चला आ रहा हे, अतएव वह दृढ स्थिति को प्राप्त है । अनन्त कोटि जन्मों में अभ्यस्त द्वैतवासनाओं से
अत्यन्त दुढीकृत होने के कारण उसका एक बार के उपदेश से भली प्रकार उच्छेद नहीं हो सकता, यह
भाव हे