Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 104
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 104 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 104
संस्कृत श्लोक
चित्रं बृहज्जालमिव चिदात्मानमुपागतः ।
सर्वं यत्रेदमस्त्येव नास्त्येव च मनागपि ।। १०४
हिन्दी अर्थ
बाहर ओर भीतर से अपने
द्वारा व्याप्त हुए जगद्गूपी पक्षियों को, विचित्र बड़े जाल की नाई, अपने भीतर फसा करके गुप्तरूप से
स्थित हुए चिदाकार आत्मरूपता को मैं प्राप्त हुआ हूँ ॥ १० ३॥ एकमात्र जिसमें यह सब जगत विद्यमान
है ओर जिसमें परमार्थतः कुछ भी नहीं है, ऐसे अद्वितीय, सृष्टिकाल में सबकी सत्ता का निर्वाहक होने
से सद्रूप ओर प्रलयकाल में सबकी सत्ता का निर्वाहक न होने से असद्रूप उस चिदात्मस्वरूप को मेँ प्राप्त
हुआ हू