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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

ब्रह्म चिद्ब्रह्म भुवनं ब्रह्म भूतपरम्पराः । ब्रह्माहं ब्रह्म मच्छत्रुर्ब्रह्म सन्मित्रबान्धवाः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

संक्षेप से कथित अर्थ को विस्तार कर विशेषरुप से दिखलाते हैं। ब्रह्म ही चित्‌ है, ब्रह्म ही चौदह भुवन है, ब्रह्म ही जीव-परम्परा है; मैं भी ब्रह्मस्वरूप हूँ, मेरा शत्रु भी ब्रह्मस्वरूप है, सन्मित्र, बन्धु-बान्धव आदि भी ब्रह्मस्वरूप हैं; तीनों काल भी ब्रह्मस्वरूप है ओर वह ब्रह्म में ही अवस्थित है