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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 86

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 86 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 86

संस्कृत श्लोक

स्वानुभूत्यैकमात्रं यच्चिद्ब्रह्मास्मि तदव्ययम् । प्रोताङ्गमपि गुप्तास्यं देहे तन्तुर्बिसे यथा ॥ ८६ ॥

हिन्दी अर्थ

उसकी नखाग्र से लेकर सभी अंगों में व्याप्ति है ओर देह का छेद होने पर भी उसका विच्छेद नहीं होता, यह कहते है । जिस प्रकार कमल के डंठल में (मृणाल में) विद्यमान सूत्र कमल के सारे शरीर में व्याप्त होकर रहने पर भी गुप्तमुख ओर छेदन एवं भेदन करने पर प्रस्फुरित रूप होकर दीखता है, उसी प्रकार सारे देह में व्याप्त होकर रहनेपर भी गुप्तमुख एवं शरीर के छेदन एवं भेदन होनेपर साक्षी होकर स्फुरितरूप होनेवाला, निर्विकार चिद्ब्रह्म मैं हूँ