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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verses 63–64

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verses 63–64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 63

संस्कृत श्लोक

शैलसागरसार्थोऽहं ब्रह्मैकत्वं किल स्थितम् । आदानदानसंकोचपूर्विका भूतशक्तयः ॥ ६३ ॥ सर्वमेव चिदात्मास्मि ब्रह्मण्याततरूपधृक् । लतागुल्माङ्कुरादीनामहंसंभवनैषिणाम् ॥ ६४ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं दयौ हूँ, मै सूर्ययुक्त आकाश हूँ, मैं दिशारूप हूँ, मैं विविध पृथ्वीरूप भी हूँ, मैं घट एवं पट का आकार हूँ, मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ, यह सत्य है ॥६ १॥ मैं तृण हूँ, मैं पृथ्वी हूँ, मैं गुल्म (स्कन्धरहित वृक्ष) हूँ, अरण्य आदि भी मैं ही हूँ, पर्वत सागर और प्राणियों का समूह भी मैं हूँ, निश्चय ही एकमात्र ब्रह्मैक्य सर्वत्र स्थित है ॥ ६ २॥ ग्रहण, परित्याग, संकोच आदि जो प्राणियों के व्यापार हैं, वह सभी कुछ तथा ब्रह्म में व्यापकरूप धारण करनेवाला चिदात्मा मैं ही हूँ