Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
स्वयं प्रभुर्महात्मैव ब्रह्म ब्रह्मविदो विदुः ।
अपरिज्ञातमज्ञानमज्ञानामिति कथ्यते ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीलिए, ब्रह्म, अज्ञो की दृष्टि से ही अज्ञानस्वरूप है, ज्ञानियों की दृष्टि से नहीं, ऐसा कहते हैं।
ब्रह्मवेत्ता महामुनियों का यह मत है कि अज्ञात हुआ, स्वयंसमर्थ, महान आत्मा ब्रह्म ही अज्ञानियों
द्वारा अज्ञानशब्द से व्यवहृत होता हे