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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 106

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 106 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 106

संस्कृत श्लोक

सर्वाकारविहारस्थं चिदात्मानमुपागतः । स्नेहाधारमथोऽशान्तं जडवाताहतिभ्रमैः ।। १०६

हिन्दी अर्थ

स्नेह अर्थात्‌ तेल के आश्रयी तथा वर्षाकालीन वायुओं से उत्पन्न भँवरों से न बुझे हुए दीपक की नाई निरुपाधि प्रेमरूप स्नेह के आश्रयी, देह एवं प्राणवायु के अध्यास से जनित भ्रमों के द्वारा नष्ट नहीं हुए युक्त (भ्रान्तदृष्टि से उन देह, प्राण आदि के अध्यासरूप भ्रमों से युक्त) और मुक्त (तत्त्वदृष्टि से उनसे रहित) चिद्रूप दीप की हम लोग बाहर एवं भीतर से उपासना करते हैं