Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 73
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 73 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 73
संस्कृत श्लोक
संभोगोत्तममाभासं चिद्ब्रह्मास्म्यपवासनम् ।
खण्डादिस्वादुसंवित्तिरीषन्मात्रा तु तिष्ठति ॥ ७३ ॥
हिन्दी अर्थ
-संभोगोत्तमम्* यह जो पहले कहा, उसे, उपपादन करके, अनुभव में चढ़ाते हैं।
रसना (जिह्ना) आदि इन्द्रियों के द्वारा जायमान मिश्री का टुकड़ा, शर्करा आदि स्वादु पदार्थो का
परिज्ञान ईषन्मात्र-यानी शर्करारस की जिह्वा से कण्ठप्रदेश प्राप्तिपर्यन्त स्वल्पतर देश और काल से
परिच्छिन्न-होकर स्थित रहता हे । वही ज्ञान -स्वप्रकाश एवं आनन्दैकरसस्वरूप से अपनी परिच्छिन्नता
के हेतुभूत चित्त, चेत्य ओर चेतयिता के ज्ञात हो जानेपर परिच्छिन्न उपाधि की विच्युतिदशा में भी
च्युतिशून्य आत्मस्वरूप हो जाता है, वही च्युतिशून्य निरतिशय आनन्दात्मक ब्रह्मस्वरूप मैं हूँ