Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verses 4–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verses 4–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 4,5
संस्कृत श्लोक
आत्मज्ञानं तु सर्वेषामिन्द्रियाणामगोचरम् ।
सत्तां केवलमायाति मनःषष्ठेन्द्रियक्षये ॥ ४ ॥
प्रोल्लङ्घयेन्द्रियजां वृत्तिं यत्स्थितं तत्कथं किल ।
याति प्रत्यक्षतां जन्तोः प्रत्यक्षातीतवृत्तिमत् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञान की सामग्री की दुर्लभता भी दिखलाते है ।
आत्मज्ञान तो सभी इन्द्रियों का अविषय है यानी किरी इन्द्रिय से आत्मज्ञान हो नहीं सकता ।
मनसहित छः इन्द्रियों का क्षय हो जाने पर वह केवल सत्ता प्राप्त करता है । इन्द्रियो से जनित वृत्ति का
अतिक्रमण कर जो अवस्थित है, वह प्राणियों का प्रत्यक्ष विषय केसे हो सकता है, क्योकि वह प्रत्यक्षवृत्ति
का अतिक्रमण कर स्थित है