Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 53
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
इदं त्वयुक्तमित्यन्तर्ज्ञाते सोदेति भावना ।
यस्मादयुक्ताद्वैरस्याद्यया किल विरज्यते ।। ५३
हिन्दी अर्थ
तब जीव और जगत में ब्रह्ममात्रत्व की भावना सहस्रा सभी को क्यों नहीं होती 2 यदि कहिए कि
वैराग्य नहीं है, इसलिए, तो वैराग्य के हेतुओं का ही पहले निर्वचन करिए, इस पर कहते हैं।
यह समस्त जगत विचार के लिए अयोग्य है, यों अपने अन्दर भली प्रकार निश्चित हो जाता है,
तभी वह ब्रह्मभावना उदित हो जाती है क्योकि इसी एकमात्र विचारणा के द्वारा अयोग्य शुक्ति-रजत में
मिथ्यात्व हो जाने से रजत की नाई पुरुष भोग्यवर्ग से विरक्त हो जाता है