Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verses 102–103
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verses 102–103 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 102
संस्कृत श्लोक
अपर्यन्तचिदारम्भं चिदात्मानमुपागतः ।
त्रैलोक्यदेहमुक्तानां तन्तुमुन्नतमाततम् ।। १०२
प्रचारसंकोचकरं चिदात्मानमुपागतः ।
लीनमन्तर्बहिःस्वाप्तान्क्रोडीकृत्य जगत्खगान् ।। १०३
हिन्दी अर्थ
जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति को करनेवाले, त्रैलोक्य में रहनेवाले देहरूप मोतियों की माला में
व्याप्त तन्तुरूप से स्थित चिदात्मरूपता को मेँ प्राप्त हो गया हू