Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 77
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 77 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 77
संस्कृत श्लोक
सत्यानुभवरूपात्म चिद्ब्रह्मात्मास्मि शाश्वतः ।
असंस्तुताध्वगालोके मनस्यन्यत्र संस्थिते ॥ ७७ ॥
हिन्दी अर्थ
किसी एक देश में अवस्थित पुरुष का मन, जब अन्यत्र कहीं दूर देश में चला जाता है, तब वह
मन अन्तराल मार्ग मे पतित सामने के पदार्थो का विस्पष्ट प्रकाश नहीं कर पाता-उन पदार्थो का
निर्विकल्प साक्षात्कार होता है । मन की उपयुक्त स्थिति होने पर अन्तराल देश में जो निष्पाप यानी
विषयसंसर्ग से शून्य प्रतीति होती है, वह चैतन्यात्मक ब्रह्मस्वरूप है, वही सर्वव्यापक मैं हूँ