Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verses 36–37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verses 36–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 36,37
संस्कृत श्लोक
तरङ्गादिमहाम्भोधौ भूतवृन्दं तथात्मनि ।
इदं नास्तीदमस्तीति भ्रान्तिर्नामात्मनात्मनि ॥ ३६ ॥
शक्तिर्निर्हेतुकैवान्तः स्फुरति स्फटिकांशुवत् ।
जगच्छक्त्यात्मनात्मैव ब्रह्म स्वात्मनि संस्थितम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार महान सागर में उललास-विलास होने पर भी तरंग आदि न उत्पन्न होते हैं और
न मरते हैं, उसी प्रकार आत्मा में भूत-समूह न उत्पन्न होते हैं और न मरते हैं ॥ ३ ५॥
“यह नहीं है और यह हे" इस प्रकार की भ्रान्तिरूपी माया किसी तरह के प्रयोजन के बिना आत्मा के
द्वारा आत्मा में ही उस प्रकार भीतर जगतरूप से और तत्-तत् पदार्थों की शक्तिरूप से स्फुरित होती
हैं, जिस प्रकार स्फटिक की अनेक प्रतिबिम्बों का ग्रहण करने में योग्यतासम्पादक स्वच्छता-अनेक
तरह के प्रतिबिम्ब और उसके गुण, क्रिया आदि वैचित्र्य के रूप से अन्दर-प्रस्फुरित होती है। श्रीरामभद्र,
जैसे जल में तरंगों के कणसमूहों से घन जल ही स्थित है, वैसे ही अपने आप में जगत की शक्ति के
रूपसे ब्रह्म ही अवस्थित है