Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 110
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 110 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 110
संस्कृत श्लोक
तैरेव रहितं शान्तं चिदात्मानमुपागतः ।
आकाशकोशविशदं सर्वलोकस्य रञ्जनम् ।। ११०
हिन्दी अर्थ
जो आकाश-मण्डल की नाई विस्तृतरूपवाला है, जो अपनी व्याप्ति के द्वारा संपूर्ण लोकों की
अभिव्यक्ति करता है, वस्तुतः जो किसीकी न अभिव्यक्ति करता हे ओर न आकाश-मण्डल के सदृश
ही है, ऐसे चिदाकार आत्मस्वरूप को मे प्राप्त हुआ हू