Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
इत्यज्ञानात्मनो मोहो नच ज्ञानात्मनः क्वचित् ।
अज्ञस्य दुःखौघमयं ज्ञस्यानन्दमयं जगत् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव तत्त्ववेत्ता पुरुष को समस्त जगत एकमात्र आनन्दरसस्वरूप अनुभूत होता है, यह
कहते हैं।
जिस प्रकार अन्धे पुरुष को जगत अन्धकार रूप और सुदृष्टिवाले को प्रकाशस्वरूप प्रतीत होता
है, उसी प्रकार अज्ञानी को यह जगत दुःख-समूहस्वरूप और ज्ञानी को आनन्दप्रचुर प्रतीत होता
है