Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 74
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 74 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 74
संस्कृत श्लोक
चित्तादिष्ववबुद्धेषु तद्धि ब्रह्माहमच्युतः ।
कान्तासंसक्तचित्तस्य चन्द्रे समुदिते सति ॥ ७४ ॥
हिन्दी अर्थ
विषयरूप उपाधि से निर्मुक्त होकर ज्ञानकी स्थिति हो ही नहीं सकती अथात् अप्रसिद्ध ही है, ऐसी
आशंका कर उसे प्रसिद्ध करते है ।
चूँकि कान्ता में आसक्त चित्तवाले पुरुष को रात्रि में चन्द्रमा का उदय होनेपर चन्द्रमा ओर
कान्ता दोनों के दर्शन-समय में मध्यवर्ती प्रदेश में चिति का विच्छेद अनुभूत नहीं होता, अतः जब
तक चन्द्रमा का ज्ञान होता रहता हे, तब तक अविच्छिन्न सत्तावाला निर्विषयक चैतन्यात्मक
ज्ञानस्वरूप ब्रह्म प्रसिद्ध है, तत्स्वरूप ही मैं हू