Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verses 60–62
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verses 60–62 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
न त्यजामि न वाञ्छामि ब्रह्माहमिति सत्यता ।
अहं रक्तमहं मांसमहमस्थीन्यहं वपुः ॥ ६० ॥
चिदहं चेतनं चाहं ब्रह्माहमिति सत्यता ।
द्यौरहं खमहं सार्कमहमाशा भुवोऽप्यहम् ॥ ६१ ॥
अहं घटपटाकारो ब्रह्माहमिति सत्यता ।
अहं तृणमहं चोर्वी गुल्मोऽहं काननाद्यहम् ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मा में परिच्छिन्नत्व और परोक्षत्व का एकमात्र निराकरण करने के लिए ही त्वम्” ओर 'तत्”
पदार्थ का परिशोधन किया गया है, उसका (परिच्छिन्नत्व एवं परोक्षत्व का) निरास करने पर आत्मा में
जब सवत्मिकत्व का लाभ हुआ, तब तो रक्त, मांस आदि रूप देह आदि भी आत्मस्वरूप ही सिद्ध हुए,
अतः उनका निरास करना अपेक्षित नहीं है, इस आशय से कहते हैं।
मैं ही रक्त हूँ, मैं ही माँस हूँ, मैं ही अस्थियाँ हूँ, मैं ही शरीर हूँ, मैं ही चितिशक्ति हूँ, मैं ही चेतन हूँ,
मैं ही ब्रह्मस्वरूप हूँ, यह निश्चित सत्य है