Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 96
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, verse 96 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 96
संस्कृत श्लोक
कृष्णं ध्वान्ते सितं चन्द्रे चिदात्मानमुपास्महे ।
आलोकं बहिरन्तस्थं स्थितं च स्वात्मवस्तुनि ।। ९६
हिन्दी अर्थ
बाहर एवं भीतर सर्वत्र प्रकाशस्वरूप से विद्यमान, अपने आत्मपदार्थमें स्थित और प्रत्यगात्मरूप
(साक्षीरूप) होने के कारण समीप में (हृदय -प्रदेश में) स्थित होनेपर भी अज्ञान से दूर-प्रदेश में स्थित
हुए चिदाकार आत्मा की हम उपासना करते हैं